श्री सत्यनारायण भगवान सम्पूर्ण पूजन विधि और व्रत कथा एवं आरती |

 पूजन विधि :-

व्रत करने वाला पूर्णिमा, संक्रांति के दिन शाम को स्नान आदि से निवृत होकर पूजा स्थान में आसन पर बैठकर श्रद्धापूर्वक श्री गणेश, गौरी, वरुण आदि सब देवताओं का ध्यान करके पूजन करें और संकल्प करे कि सत्यनारायण स्वामी का पूजन तथा कथा श्रवण सदैव करूंगा | पुष्प हाथ में लेकर सत्यनारायण का ध्यान करें, यज्ञोपवीत पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि से युक्त होकर स्तुति करें - हे भगवान ! मैंने श्रद्धापूर्वक फल, जल आदि सब सामग्री आपको अर्पण की है, इसे स्वीकार कीजिए| मेरा आपको बारम्बार नमस्कार हैं, इसके बाद सत्यनारायण भगवान की कथा पढ़े  अथवा श्रवण करें |



व्रत कथा :-

                                                                    प्रथम अध्याय 

एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि  88000 ऋषियों ने श्री सूत जी से पूछा - हे प्रभु! इस कलियुग में वेद - विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिलेगी तथा उनका उद्धार कैसे होगा, हे श्रेष्ठ मुनि! कोई ऐसा तप कहिए जिसमे थोड़े से समय में पुण्य प्राप्त हो तथा मनवांछित फल मिले, वह कथा सुनने की हुमारी इच्छा है| सर्वशास्त्र ज्ञाता श्री सूत जी  बोले - हे वैष्णवों में पूज्य ! आप सबने प्राणियों के हित की बात पूछी है | अब मैं उस श्रेष्ठ व्रत को आप लोगों से कहूँगा, जिस व्रत को नारद जी ने लक्ष्मी नारायण से पूछा था और लक्ष्मी नारायण ने मुनि श्रेष्ट नारद से कहा था, सो ध्यान से सुनो -

एक समय योगीराज नारद जी दूसरों के हित की इच्छा से अनेक लोको में घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुचें | यहाँ अनेक योनियों में जन्मे हुए प्रायः सभी मनुष्यों को अपने कर्मों के द्वारा अनेकों दुःखों से पीड़ित देखकर सोचा, किस यत्न के करने से निश्चये ही दुखों का नाश हो सकेगा | ऐसा मन में सोचकर विष्णु लोक को गये |

वहाँ श्वेतवर्ण और चार भुजाओं वाले देवों के ईश नारायण को जिनके हाथ में शंख, चक्र, गदा और पदम थे तथा वरमाला पहने हुए थे, उन्हे देखकर स्तुति करने लगे | हे भगवान! आप अत्यंत शक्ति से सम्पन्न हैं | मन तथा वाणी से आपको कोई नहीं पा सकता | आपका आदि मध्य अन्त  भी नहीं है| निर्गुण स्वरूप सृष्टि के कारण भक्तों के दुखों को नष्ट करने वाले हो| आपको मेरा नमस्कार है| नारद जी से इस प्रकार की स्तुति सुनकर विष्णु भगवान बोले कि - हे मुनि श्रेष्ठ ! आपके मन में क्या है? आपका किस काम के लिए यह आगमन हुआ है, निः संकोच कहो| तब नारद जी बोले - मृत्यु लोक में सभी मनुष्य जो अनेक योनियों में पैदा हुए हैं , अपने- अपने कर्मों के द्वारा अनेक प्रकार के दुखों से दुखी हो रहे हैं| हे नाथ मुझ पर दया रखते हैं तो बताईए की उन मनुष्यों के सभी दुख थोड़े से ही प्रयत्न से कैसे दूर हो सकते हैं| श्री भगवान बोले - हे नारद ! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी हैं | जिस काम के करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है वह मैं कहता हूँ सुनो -  बहुत पुण्य देने वाला स्वर्ग तथा मृत्युलोक दोनों में दुर्लभ एक उत्तम व्रत है | आज मैं प्रेमवश होकर तुमसे कहता हूँ सत्यनारायण का यह व्रत अच्छी तरह विधिपूर्वक करके मनुष्य तुरंत ही यह सुख भोगकर मरने पर मोक्ष को प्राप्त होता है | श्री भगवान के वचन सुनकर नारद मुनि बोले - उस व्रत का फल क्या है? क्या विधान है किसने यह व्रत किया है और किस दिन यह व्रत करना चाहिए? विस्तार से कहो | भगवान बोले - दुख शोक आदि को दूर करने वाला धन - धान्य को बढ़ाने वाला, सौभाग्य तथा संतान को प्राप्त कराने वाला यह व्रत सब स्थानों पर विजयी करने वाला है भक्ति और श्रद्धा के साथ किसी भी दिन मनुष्य सहरी सत्यनारायण की शाम के समय ब्राह्मणों और बंधुओं के साथ धर्म परायण होकर पूजा करे |

भक्ति भाव से नेवेद्य , केले का फल , घी दूध और गेहूँ का चूर्ण सवाया लेवे| गेहूँ के अभाव मे साठी का चूर्ण , शक्कर तथा गुड़ लें और सब भक्षण योग्य पदार्थ जमा करके भगवान को अर्पण करें तथा बंधुओं सहित ब्राह्मणों को भोजन करावे पश्चात स्वयं भोजन करें| नृत्य, गीत आदि का आचरण कर सत्यनारायण भगवान का स्मरण करते हुए समय व्यतीत करे| इस तरह व्रत करने पर मनुष्यों की इच्छा निश्चय पूर्ण होती है| विशेष कर कलिकाल मे मृत्युलोक में यही मोक्ष का सरल उपाय है |

            || इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का प्रथम अध्याय सम्पूर्ण ||


                                            दूसरा अध्याय 

सूत जी बोले - ऋषियों! जिसने पहले समय में इस व्रत को किया है उसका इतिहास कहता हूँ ध्यान से सुनो, सुन्दर काशीपुरी नागरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था| वह भूख और प्यास से बेचैन हुआ नित्य पृथ्वी पर घूमता था, ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले भगवान ने ब्राह्मण को दुखी देखकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप दर उसके पास जा आदर के साथ पूछा - हे विप्र ! नित्य दुखी हुआ पृथ्वी पर क्यों घूमता हैं? श्रेष्ठ ब्राह्मण यह सब मुझसे कहो, मैं सुनना चाहता हूँ | ब्राह्मण बोला - मैं निर्धन हूँ, भिक्षा के लिए पृथ्वी पर फिरता हूँ | हे भगवान! यदि आप इसका उपाय जानते हो तो कृपया कर कहो वृद्ध ब्राह्मण बोल की सत्यनारायण भगवान मनवांछित फल देने वाले हैं इसलिए हे ब्राह्मण तू उनका पूजन कर जिसके करने से मनुष्य सब दुखों से मुक्त होता है| ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बतला कर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले सत्यनारायण भगवान अंतर्ध्यान हो गये| जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण ने बतलाया है, मैं उसको करूंगा, यह निश्चय करने पर उसे रात में नींद नहीं आई | वह सवेरे उठ सत्यनारायण भगवान के व्रत का निश्चय कर भिक्षा मांगने के लिए चल दीया |

उस दिन उसको भिक्षा में बहुत धन मिला, जिससे बंधु - बांधवों के साथ उसने सत्यनारायण का व्रत किया | इसके करने से वह विप्र सब दुखों से छूटकर अनेक प्रकार की संपत्तियों से युक्त हुआ | उस समय से वह विप्र हर मास व्रत करने लगा| इस तरह सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो करेगा वह सब पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त करेगा | आगे जो पृथ्वी पर सत्यनारायण का व्रत करेगा | वह सब दुखों से छूट जाएगा | 

                || इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा द्वितीय अध्याय सम्पूर्ण || 


                                        तीसरा अध्याय 

           सूत जी ने कहा - हे विप्रो ! इस तरह नारद जी से नारायण से कहा हुआ यह व्रत मैंने तुमसे कहा - हे विप्रो मैं अब और क्या कहूँ| ऋषि बोले - हे मुनीश्वर ! संसार में इस विप्र से सुनकर किस-किस ने इस  व्रत को किया, हम वह सब सुनना चाहते हैं| इसके किए हुमारे मन में श्रद्धा हैं| सूत जी बोले - मुनियों ! जिस-जिस ने इस व्रत को किया हैं वह सुनों| एक समय एक ब्राह्मण धन और ऐश्वर्य के अनुसार बंधु-बांधवों के साथ व्रत करने को तैयार हुआ उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया और बाहर लकड़ियों को रखकर विप्र के मकान में गया| प्यास से दुखी लकड़हारा उनको व्रत करते देखकर विप्र को नमस्कार कर कहने लगा कि आप यह क्या कर रहे हैं और इसके करने से क्या फल मिलता है? कृपा करके मुझसे कहो|

    ब्राह्मण ने कहा - सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है, इसकी ही कृपा से मेरे यहाँ धन-धान्य  आदि की वृद्धि हुई है विप्र से इस व्रत के बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ| चरणामृत ले और प्रसाद खाने के बाद अपने घर को गया|

    लकड़हारे ने अपने मन में इस प्रकार का संकल्प किया कि आज ग्राम में लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उससे सत्यनारायण देव का उत्तम व्रत करूंगा | यह मन में विचार कर यह बूढ़ा लकड़हारा लकड़ियों को अपने सिर पर रखकर जिस नगर में धनवान लोग रहते थे, वह ऐसे सुन्दर नगर में गया| उस रोज वहाँ पर उन लकड़ियों का दाम पहले दिनों से चौगुना मिला| तब वह बूढ़ा लकड़हारा दाम ले और प्रसन्न होकर पके केले की फली, शक्कर, घी, दुग्ध, दही और गेहूँ का चूर्ण इत्यादि सत्यनारायण भगवान के व्रत की कुल सामग्रियों को लेकर अपने घर गया| फिर उसने अपने भाईयों को बुलाकर विधि के साथ भगवान जी का पूजन और व्रत किया| उस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन, पुत्र आदि से युक्त हुआ और संसार के समस्त सुख भोगकर बैकुंठ को चला गया|

              || इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा तृतीय अध्याय सम्पूर्ण ||


                                               चौथा अध्याय  

सूत जी बोले - हे श्रेष्ठ मुनियों अब आगे की कथा कहता हूँ| सुनों प्राचीन समय में उलकामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था| वह सत्यवक्ता और जितेंद्रियए था प्रतिदिन देव स्थानों पर जाता तथा गरीबों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था| उसकी पत्नी कमाल के समान मुख वाली और सती साध्वी थी| भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनों ने श्री सत्यनारायण का व्रत किया| उस समय में वहाँ एक साधु वैश्य आया| उसके पास व्यापार के लिए बहुत सा धन था| वह नाव को किनारे पर ठहराकर राजा के पास आ गया और राजा को व्रत करते हुए देखकर विनय के साथ पूछने लगा हे राजन! भक्ति और युक्ति चित से यह आप क्या कर रहे हैं? मेरी सुनने की इच्छा है| सो आप यह मुझे बताईये|

राजा बोले - हे साधु! अपने बांधवों के साथ पुत्रादि की प्राप्ति के लिए एक महाशक्तिवान सत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन किया जा रहा है| राजा के वचन सुनकर साधु वैश्य आदर से बोला - हे राजन! मुझसे इसका सब विधान कहो मैं भी आपके कथनानुसार इस व्रत को करूंगा| मेरे कोई भी संतान नहीं है और इससे निश्चय होगी | राजा से सब विधान सुन व्यापार से निवृत हो वह आनंद के साथ घर गया | साधु ने अपनी स्त्री से संतान देने वाले उस व्रत का समाचार सुनाया और कहा कि जब मेरे संतान होगी तब मैं उस व्रत को करूंगा | साधु वैश्य ने ऐसे वचन अपनी स्त्री लीलावती से कहे | एक दिन उसकी स्त्री लीलावती पति के साथ आनंदित हो सांसारिक धर्म में प्रवृत होकर सत्यनारायण भगवान की कृपया से गर्भवती हो गई तथा दसवें महीने में उसको एक सुन्दर कन्या का जन्म हुआ| वह दिनों दिन इस तरह बढ़ने लागि जैसे शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़ता है| कन्या का नाम कलावती रखा गया| तब लीलावती ने मीठे शब्दों में अपने पति से कहा - जो आपने संकल्प किया था कि भगवान का व्रत करूंगा अब आप उसे करिए! साधु बोला - हे प्रिये! इसके विवाह पर करूंगा | इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वाशन दे वह नगर को गया| कलावती पितृ - गृह में वृद्धि को प्राप्त हो गई| साधु ने जब नगर में सखियों के साथ अपनी पुत्री को देखा तो तुरन्त ही दूत बुलाया कर कहा - पुत्री के लिए कोई सुयोग्य वर देखकर लाओ| साधु की आज्ञा पाकर दूत कंचन नगर पहुचा और वहाँ बड़ी खोज और देखभाल कर लड़की के लिए सुयोग्य लड़के को देखकर साधु ने अपने बंधु बांधवों सहित प्रसन्नचित अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया, किन्तु दुर्भाग्य से विवाह के समय भी उस व्रत को करना भूल गया| तब श्री भगवान क्रोधित हो गये और श्राप दिया कि तुम्हें दारुण दुख प्राप्त होगा| अपने कार्य में कुशल साधु बनिया जामाता सहित समुद्र के समीप स्थित रतनपुर नगर में गया और वहाँ दोनों ससुर जमाई चंद्रकेतु राजा के उस नगर में व्यापार करने लगे | एक रोज भगवान सत्यनारायण की माया से प्रेरित कोई चोर राजा का धन चुराकर भागा जा रहा था, किन्तु राजा के दूतों को आता देखकर चोर ने घबराकर भागते हुए राजा के धन को चुपचाप वहीं रख दिया जहां वो ससुर जमाई ठहरे हुए थे | जब दूतों ने उस साधु वैश्य के पास जाकर राजा के धन को पाया तो दोनों को बांधकर ले गये और प्रसन्नता से दौड़ते हुए राजा के समीप जाकर कहा - यह दो चोर हम पकड़ कर लाये हैं | राजा की आज्ञा से उनको कठिन कारावास में डाल दिया और उनका धन छीन लिया गया | 

                 || इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण ||


                                        पाँचवा अध्याय 

सत्यनारायण भगवान के श्राप द्वारा उनकी पत्नी भी घर पर बहुत पीड़ा तथा भूख प्यास से अति दुखित हो अन्न की चिन्ता में कलावती एक ब्राह्मण के घर गई | वहाँ उसने सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा, फिर कथा सुनी तथा प्रसाद ग्रहण कर रात को घर आई | माता ने कलावती से कहा - पुत्री! अब तक कहां रही व तेरे मन में क्या है? कलावती बोले - हे माता ! मैंने एक ब्राह्मण के घर श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन देखा है| कन्या के वचन सुन कर लीलावती भगवान के पूजन की तैयारी करने लगी | लीलावती ने परिवार और बंधुओ सहित श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और वर मांगा मेरे पति और दामाद शीघ्र घर आ जावें और साथ ही प्रार्थना की कि हम सबका अपराध क्षमा करो| सत्यनारायण भगवान इस व्रत से संतुष्ट हो गये और राजा चंद्रकेतु को स्वपन में दर्शन देकर कहा - हे राजन! दोनों वैश्यों को प्रातः ही छोड़ दो और उनका सब धन जो तुमने ग्रहण किया है दे दो, नहीं तो में तेरा धन, राज्य पुत्रादि सब नष्ट कर दूंगा| राजा से ऐसे वचन कहकर भगवान अंतर्ध्यान हो गये| प्रातः काल राजा चंद्रकेतु ने सभा में अपना स्वपन सुनाया फिर दोनों वणिक पुत्रों को कारागार से मुक्त कर सभा में बुलाया | दोनों ने आकर राजा को नमस्कार किया राजा मीठे वचनों से बोला - हे महानुभावों! भाविवश ऐसा कठिन दुख प्राप्त हुआ है, अब तुम्हें कोई भय नहीं| ऐसा कहकर राजा ने उनको नये - नये वस्त्राभूषण पहनाये तथा उनका जितना धन लिया था उससे दोगुना धन देकर आदर सहित विदा किया | दोनों वैश्य अपने घर को चल दिए |

           || इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा पंचम अध्याय सम्पूर्ण || 

                                        छठा अध्याय 

सूत जी बोले - वैश्य मंगलाचार करके यात्रा आरम्भ की और अपने नगर को चला उनके थोड़ी दूर निकलने पर दण्डी वेषधारी सत्यनारायण ने उनसे पूछा - हे साधु! तेरी नाव में क्या है? अभिमानी वणिक हँसता हुआ बोला - हे दण्डी! आप क्यों पूछते हो? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल और पत्ते भरे हैं? वैश्य का कठोर वचन सुनकर भगवान ने कहा - तुम्हारा वचन सत्य हो, दण्डी ऐसा कहकर वहाँ से दूर चले गये और कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गये| दण्डी के जाने पर वैश्य ने नित्य क्रिया करने के बाद नाव को ऊंची उठी देखकर अचम्भा किया तथा नाव में बेल-पते आदि देखकर मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ा| फिर मूर्छा खुलने पर अत्यन्त शोक न करें यह दण्डी का श्राप है | अतः उनकी शरण में चलना चाहिए तभी हुमारी मनोकामना पूरी होगी | दामाद के वचन सुन वह दण्डी के पास पहुचा और अत्यन्त भक्ति भाव से नमस्कार करके बोला - मैंने जो आपसे असत्य वचन कहें उसके लिए मुझे क्षमा करो | ऐसा कहकर महान शोकातुर हो रोने लगा |
तब दण्डी भगवान बोले - हे वणिक पुत्र! मेरी आज्ञा से बार - बार तुम्हें दुख प्राप्त हुआ है, तू मेरी पूजा से विमुख हुआ | साधु बोला -  हे भगवान! आपकी माया से ब्रह्मा आदि भी आपके रूप को नहीं जानते, तब मैं अज्ञानी कैसे जान सकता हूँ | आप प्रसन्न होइये मैं सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा , मेरी रक्षा करो और पहले के समान नौका को धन से भर दो | उसके भक्ति युक्त वचन सुनकर दण्डी भगवान ने उन्हे क्षमा कीय त नौका को धन से भर दी तब साधु ने भगवान सत्यनारायण का पूजन कर साथियों सहित अपने नगर को चला | जब अपने नगर के निकट पहुचा तब दूत को घर भेजा | दूत ने साधु के घर जा उसकी स्त्री को नमस्कार कर कहा कि साधु अपने दामाद सहित इस नगर के समीप आ गये हैं | ऐसा वचन सुन साधु की स्त्री ने बड़े हर्ष के साथ सत्यदेव का पूजन कर पुत्री से कहा - मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ | तू कार्य पूर्ण कर शीघ्र आ | माता के ऐसे वचन सुनकर कलावती प्रसाद छोड़कर पति के पास गई | प्रसाद की अवज्ञा के कारण सत्यदेव ने रूष्ट हो, उसके पति को नाव सहित पानी में डुबो दिया | कलावती अपने पति को न देखकर रोती हुई जमीन पर गिर पड़ी | इस तरह नौका को डूबा हुआ तथा कन्या को रोता देख साधु दुखित हो बोला - हे प्रभु! मुझसे या मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करो | उसके दीन वचन सुनकर सत्यदेव प्रसन्न हो गये और आकाशवाणी हुई हे साधु! तेरी कन्या मेरे प्रसाद को छोरकर आई है , इसलिए इसका पति अदृश्य हुआ है, यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटे तो इसे पति अवश्य मिलेगा | ऐसी आकाशवाणी सुनकर कलावती ने घर पहुंचकर प्रसाद खाया | फिर आकर पति के दर्शन किये तत्पश्चात साधु ने बंधु-बांधवों सहित सत्यदेव का विधिपूर्वक पूजन किया | इस लोक का सुख भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को गया |
                       || इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा षष्ठ अध्याय सम्पूर्ण ||

                                            सातवाँ अध्याय 

सूत जी बोले - हे ऋषियों! मैं और भी कथा कहता हूँ, सुनों! प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था | उसने भी भगवान का प्रसाद त्यागकर बहुत दुख पाया | एक समय वन में जाकर वन्य पशुओं को मारकर बड़ के पेड़ के नीचे आया, वहां उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से बांधवों सहित सत्यनारायण जी का पूजन करते देखा | राजा देखकर भी अभिमान वश वहां नहीं गया और न नमस्कार ही किया | जब ग्वालों ने भगवान का प्रसाद उसके सामने रखा तो वह प्रसाद को त्यागकर अपनी नगरी को चला गया| वहाँ पहुंचकर उसने अपना सब कुछ नष्ट पाया टरोह वह समझ गया कि यह सब भगवान ने किया है | तब वह विश्वास कर ग्वालों के समीप गया और विधिपूर्वक पूजन कर प्रसाद खाया तो सत्यदेव की कृपा से पहले जैसा था, सब वैसा ही हो गया फिर दीर्घ काल तक सुख भोगकर मरने पर स्वर्गलोक को गया | जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को करेगा | भगवान की कृपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी | निर्धन धनी और बंदी बंधन से मुक्त होकर निर्भय हो जाता है | संतानहीनों को संतान प्राप्त होती है तथा सब मनोरथ पूर्ण होकर अन्त में बैकुंठ को जाता है |
    जिन्होंने पहले इस व्रत को किया अब उनके दूसरे जन्म की कथा कहता हूँ | वृद्ध शतानन्द ब्राह्मण ने सुदामा का जन्म लेकर मोक्ष को पाया | उलकामुख नाम का राजा दशरथ होकर बैकुंठ को प्राप्त हुआ | साधु नाम के वैश्य ने मोर ध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीर कर मोक्ष को प्राप्त किया | महाराज तुंगध्वज ने स्वयं भस्म होकर भगवान में भक्ति युक्त हो कर्म कर मोक्ष की प्राप्ति की |

                         || इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा सप्तम अध्याय सम्पूर्ण ||


                                    श्री विष्णु भगवान जी की आरती 

जय लक्ष्मी रमणा  जय लक्ष्मी रमणा | सत्यनारायण स्वामी जन पातक हरणा |
रत्न जड़ित सिंहासन अद्भूत छवि राजे | नारद करत निरन्तर घण्टा ध्वनि बाजे | 
प्रकट भय कलि कारण द्विज को दर्श दियो | बूढ़ों ब्राह्मण बनके कंचन महल कियो |
दुर्बल भील कराल जिन पर कृपा करी | चंद्रचूड़ एक राजा तिनकी विपति हरी |
वैश्य मनोरथ पायो श्रद्धा तज दीनी | सो फल भोग्यों प्रभु जी फिर स्तुति कीनी |
भाव भक्ति के कारण छिन्न छिन्न रूप धरो | श्रद्धा धारण कीनी तिनको काज सरयो |
ग्वाल बाल संग राजा वन में भक्ति करी | मनवांछित फल दीना दीन दयाल हरी |
चढ़त प्रसाद सवाया कदली फल मेवा | धूप दीप तुलसी से राजी सत्य देवा |
श्री सत्यनारायण जी की आरती जो कोई नर गावे | भगत दास मनसुख मनवांछित फल पावे |

                            || इति श्री विष्णु भगवान जी की आरती सम्पूर्ण ||

                                    आरती ॐ जय जगदीश हरे 

ॐ  जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे, भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे || ॐ ||
जो धयावे फल पावे दुख विनशे मन का, सुख संपति घर आवे कष्ट मिटे टन का || ॐ ||
मात-पिता तुम मेरे शरण गहूँ किसकी, तुम बिन और न दूजा आस करूं जिसकी || ॐ ||
तुम पूर्ण परमात्मा तुम अंतर्यामी, पारब्रह्म परमेश्वर तुम सबके स्वामी || ॐ ||
तुम करुणा के सागर तुम पालन कर्ता, मैं मूर्ख खलकामी कृपा करो भर्ता || ॐ ||
तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति, किस विधि मिलूँ दयामय तुमको मैं कुमति || ॐ ||
दीनबंधु दुख हर्ता तुम रक्षक मेरे, अपने हाथ उठाओ द्वार पड़ा मैं तेरे || ॐ ||
विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ संतन की सेवा || ॐ ||
तन मन धन सब कुछ है तेरा "प्रभु", तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा || ॐ ||
श्री भगवान जी की आरती जो कोई नर गावे, कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे || ॐ ||

                            || इति श्री आरती ॐ जय जगदीश हरे सम्पूर्ण ||

                                                      

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